
साल था 1983, Scuba divers का एक group, India के कच्छ reason मे समुद्र की गहराइयों को explore कर रहा था, तभी वहां उन्होंने कुछ ऐसा पाया जो दुनिया का इतिहास हमेशा के लिए बदल कर रख दिया । वे जैसे जैसे समुद्र के गहराईयों में आगे बढ़ते जा रहे थे उनको अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था। जी हां दोस्तों वे लोग जो कुछ भी अपनी आंखों से देख रहे थे वह उनकी imagination के परे प्रतीत हो रहा था ।
समुद्र की गहराईयों में, उन्हें मानव निर्मित पत्थर, महल, मंदिर, सड़कें, पुल, सीढ़ियाँ, और मूर्तियाँ जैसे कई अवशेष दिख रहे थे और इतना ही नहीं ये सारी चीजें एक बहुत बड़े क्षेत्र मे फैली हुई थी। इसे देखने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई एक प्राचीन सभ्यता का उन्नत शहर (Ancient Submerged City ) समुद्र में धराशाई हो गया हो ।
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जैसे-जैसे वे चीजें को देखते गए वह चीजें उनके लिए रहस्य बनता गया । क्या यह वास्तव में प्राचीन समय का कोई खोया हुआ शहर था? क्या यह वही शहर था,जिसका जिक्र महाभारत जैसी महाकाव्य में है, जिसे भगवान श्री कृष्ण ने अपनी राजधानी के रूप में चुना था , यानी Dwarka Nagri ?
द्वारका का निर्माण और महाभारत का जिक्र । The Construction of Dwarka and Its Mahabharata Connection
महाभारत में द्वारका (Dwarka Nagri) को एक अद्वितीय और भव्य नगर के रूप में वर्णित किया गया है, जो भगवान कृष्ण की प्रतिभा और कौशल का अद्भुत उदाहरण है। जब मथुरा पर बार-बार कंस के ससुर और जरासंध के आक्रमण होने लगे, तब कृष्ण ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए मथुरा छोड़कर समुद्र के किनारे एक नए नगर का निर्माण किया। इस नगर को भगवान विष्णु के वास्तुकार विश्वकर्मा ने बनाया था।

द्वारका को समुद्र के बीच में बसाया गया था ताकि इसे दुश्मनों से सुरक्षित रखा जा सके। यह नगर सात द्वारों से सुरक्षित थी और इसे समुद्र की लहरों से बचाने के लिए मजबूत किलेबंदी की गई थी। द्वारका का वर्णन “सुनहरे नगर” के रूप में किया गया है, क्योंकि इसमें महल, मंदिर और मकान सभी सोने, चांदी और कीमती पत्थरों से सजाए गए थे।
यहाँ की सड़कें चौड़ी और सुनियोजित थीं।कहा जाता है कि द्वारका का निर्माण इतनी तेज गति से हुआ कि यह केवल भगवान कृष्ण के दिव्य चमत्कार से संभव था।
महाभारत में यह भी उल्लेख मिलता है कि द्वारका में भगवान कृष्ण का महल असाधारण रूप से सुंदर था, जिसमें अद्वितीय कलाकृति और तकनीकी विशेषताएँ थीं।महाभारत के युद्ध के बाद, जब भगवान कृष्ण ने अपना अवतार समाप्त किया और पृथ्वी से विदा ली, तो द्वारका का पतन शुरू हो गया। यह नगर धीरे-धीरे समुद्र में समा गया, और इस घटना को “प्रकृति का चक्र” कहा गया।
सदियों से, लोग द्वारका के बारे में कहानियाँ सुनते आ रहे थे। लेकिन अब तक किसी ने भी इस प्राचीन शहर का ठोस प्रमाण नहीं पाया था—लेकिन अब ,यह पहली बार था जब महाभारत में वर्णित भगवान् श्री कृष्ण का बसाया हुआ शहर ‘द्वारका’ का अवशेष समुद्र की गहराईयों में साक्ष्य मिल रहा था।
वैज्ञानिक जांच: द्वारका के अस्तित्व को साबित करना । Scientific Investigations: Proving the Existence of Dwaraka
शोधकर्ताओं ने इस submerged city की जांच करने के लिए विभिन्न Scientific techniques का उपयोग किया, ताकि यह साबित किया जा सके कि यह सचमुच प्राचीन द्वारका थी, जैसा कि महाभारत में वर्णित है।
समुद्र की गहराई में पाई गई संरचनाएँ, मूर्तियाँ, और अन्य वस्तुएं वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य थीं, जिनका अध्ययन करने के लिए उन्होंने modern technology का सहारा लिया।
कार्बन डेटिंग: द्वारका का प्राचीन कालक्रम । Carbon Dating: An Ancient Timeline of Dwaraka Nagri
सबसे पहले, इस submerged city के अवशेषों का कार्बन डेटिंग किया गया जहां से यह पता चला कि यह अवशेष 5000 से 7000 साल पुराना है । यह समय अवधि बिल्कुल महाभारत काल से मेल खाती है,

इसके बाद further अध्ययन करने के लिए सेटेलाइट से ली गई तस्वीरों का उपयोग किया गया। इन तस्वीरों में समुद्र के नीचे दिखने वाले पत्थरों और संरचनाओं के आकार का मिलान किया गया, जो मानव निर्मित प्रतीत हो रहे थे। इस परीक्षण में ये पाया कि ये संरचनाएँ किसी सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया से नहीं बनी है बल्कि इसे बनाया गया था।
साथ ही, समुद्र के अंदर पाए गए महल, मंदिर और सड़कें इस बात के संकेत दे रहे थे कि यह एक समृद्ध और विकसित शहर था बिल्कुल वैसा ही जैसा की महाभारत में द्वारका के बारे मे वर्णित है।
द्वारका का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व । Religious and Cultural Significance of Dwarka
आर्कियोलॉजिस्ट टिम ने समुद्र में डूबे हुए क्षेत्र में मिले मूर्तियों,देवी-देवताओं की प्रतिमाओं, और अन्य धार्मिक वस्तुओं का गहन अध्ययन किया। इनमें से कुछ मूर्तियाँ काफी अच्छी स्थिति में पाई गईं, जो इस बात को प्रमाणित करती है कि यह स्थल किसी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का था। विशेष रूप से भगवान श्री कृष्ण की मूर्तियाँ और उनके मंदिर के अवशेषों ने इस शहर के धार्मिक महत्व को दर्शाया।
समुद्र के तल में पाए गए इस submerged city के अवशेषों ने यह साबित किया कि प्राचीन सभ्यताओं के बारे में अभी भी बहुत कुछ अज्ञात है।
क्या समुद्र के नीचे खोए हुए शहर और सभ्यताओं के रहस्यों को हम कभी समझ पाएंगे? क्या यह submerged city प्राचीन द्वारका है, या फिर यह किसी और प्राचीन शहर का हिस्सा था? यह सवाल आज भी कुछ वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए एक चुनौती बना हुआ है।
समुद्र में क्यों समा गया द्वारका ? Why Did Dwarka Submerge into the Ocean?
जब समुद्र में डूबे हुए शहर द्वारका की खोज की गई, तो यह सवाल उठता है कि आखिर क्यों यह शहर समुद्र में डूब गया। क्या यह सचमुच एक प्राकृतिक आपदा थी, या इसके पीछे कोई और रहस्यमय कारण था? महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में द्वारका के समुंदर में डूबने का उल्लेख है, लेकिन इसके पीछे की सटीक वजह पर बहुत से सिद्धांत सामने आए हैं। शोधकर्ताओं और इतिहासकारों ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए कई तरह के विचार व्यक्त किए हैं।

एक प्रमुख सिद्धांत यह है कि द्वारका का डूबना एक प्राकृतिक आपदा के कारण हुआ था। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि द्वारका का समुंदर में डूबना भूकंप, सुनामी या किसी बड़े जलवर्धन के कारण हुआ था। इस सिद्धांत के समर्थन में, समुद्र के तल में पाए गए अवशेषों से यह भी संकेत मिलता है कि द्वारका का समुंदर में डूबना अचानक और हिंसक तरीके से हुआ था। समुद्र में पाए गए भवनों और महलों के अवशेषों से यह लगता है कि यह शहर किसी समय अचानक जलमग्न हो गया था।
दूसरी ओर, कुछ पुरातत्वविदों और स्कॉलर्स का मानना है कि द्वारका का डूबना किसी प्रकार की मानव-निर्मित आपदा का परिणाम था। इस सिद्धांत के अनुसार, प्राचीन काल में द्वारका एक बहुत ही समृद्ध और शक्तिशाली शहर था, और इसका विकास बहुत तेज़ी से हुआ था। लेकिन उस समय की शक्तियों के बीच युद्ध और प्रतिस्पर्धा ने इस महान शहर को नष्ट कर दिया।
महाभारत में वर्णित है कि भगवान श्री कृष्ण ने अपने राक्षसी प्रतिद्वंद्वियों से लड़ाई के दौरान द्वारका को बचाने की कोशिश की, लेकिन अंततः यह शहर समुद्र में डूब गया।
क्या यह सब प्राकृतिक आपदाओं के कारण था, या फिर किसी महान युद्ध का परिणाम था?
महाभारत में भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़े कई रहस्यमय तत्व हैं। द्वारका के डूबने के समय का भी उल्लेख महाभारत में किया गया है, जिसमें यह कहा गया है कि द्वारका का समुंदर में डूबना उस समय हुआ, जब भगवान श्री कृष्ण का अंतिम समय आया था।
क्या यह सचमुच एक शारीरिक या भौतिक घटना थी, या फिर भगवान श्री कृष्ण की दिव्य शक्ति का परिणाम था, जिसे हमने अब तक पूरी तरह से समझा नहीं है?
क्या द्वारका की तकनीकी प्रगति ने शहर के पतन का कारण बना?Could Dwaraka’s Technology Have Caused the City’s Downfall?
एक अन्य सिद्धांत यह है कि द्वारका का डूबना एक प्राचीन तकनीकी या खगोलशास्त्रीय घटना का परिणाम था। कुछ Researchers का मानना है कि द्वारका एक अत्याधुनिक तकनीकी समाज था, और उनकी तकनीकों ने समुद्र के स्तर को प्रभावित किया, जिससे यह शहर डूब गया। क्या यह वह समय था जब लोग समुद्र के भीतर शक्तिशाली उपकरणों का उपयोग करते थे, और उनके द्वारा की गई तकनीकी गलती के कारण द्वारका डूब गई?
क्या द्वारका का डूबना वास्तव में एक पौराणिक कथा थी, या फिर यह एक ऐतिहासिक घटना थी, जो समय के साथ myth में बदल गई?
इस सवाल का उत्तर हमें आने वाले शोधों से ही मिल सकता है।
खोए हुए शहरों के रहस्य | The Mysteries of Lost Cities
वैज्ञानिक और पुरातत्वविदों का मानना है कि समुद्र के नीचे पाए गए द्वारका के अवशेषों की सही और विस्तृत जांच से हमें प्राचीन सभ्यता के बारे में और अधिक महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिल सकती हैं।
समुद्र के नीचे के अवशेषों का अध्ययन केवल ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी किया जा सकता है। इससे यह भी पता चल सकता है कि उस समय के लोग किस तरह की तकनीकें और विज्ञान का उपयोग करते थे, और उनके जीवनशैली कैसी थी।
कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि समुद्र में डूबे हुए द्वारका के अवशेषों में छिपे हुए और भी कई रहस्यमय तत्व हो सकते हैं, जिनसे हमें प्राचीन हिंदू धर्म, संस्कृति और सभ्यता के बारे में नई जानकारी मिल सकती है। क्या यह अवशेष उस समय की तकनीकी प्रगति और ज्ञान का प्रमाण हैं, जिसे हम अब तक पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं? क्या ये अवशेष यह साबित करते हैं कि प्राचीन काल में मानवता ने बहुत ही उन्नत और अद्भुत विज्ञान का विकास किया था?
इस submerged city द्वारका के बारे में और क्या-क्या महत्वपूर्ण खोजें हो सकती हैं, इसका जवाब समय के साथ ही मिलेगा। जैसे-जैसे नई तकनीकें और उपकरण विकसित होंगे, वैसे-वैसे इस रहस्य को सुलझाने में और मदद मिल सकती है। आज के समय में जिस प्रकार की तकनीकें और विधियाँ उपलब्ध हैं, उनकी मदद से यह संभव है कि हम समुद्र के नीचे स्थित उन अवशेषों के बारे में और भी जानकारी प्राप्त करें।
Dwarka Nagri के पर्यटन के लिए सरकारी पहल । Government initiative for tourism of Submerged Dwarka city
भारत सरकार ने भगवान कृष्ण की submerged city द्वारका नगरी को लेकर बढ़ती जिज्ञासा और रुचि को देखते हुए इसे पर्यटन के केंद्र में लाने की कोशिश की है । इसके तहत द्वारका नगरी के समुद्री किनारे पर सबमरीन से पर्यटन शुरू किया गया है।

सबमरीन में एक साथ 25 -30 पर्यटकों के बैठने की व्यवस्था रहता है. इसे दो अनुभवी पायलट और प्रोफेशनल क्रू के साथ भेजा जाता है, पानी के 300 फिट नीचे यानी पानी के अंदर करीब 100 मीटर नीचे द्वारका आईलैंड की समुद्री विशेषताएं देखने को मिलेगी. इसमें हर एक व्यक्ति के पास व्यू विंडो रहता है, जहां से लोग मरीन लाइफ को भी explore कर सकते हैं ।
सरकार के इस प्रयास का उद्देश्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को दुनिया के सामने लाना है। अगर आप भगवान कृष्ण की द्वारका नगरी के बारे में अधिक जानना चाहते हैं, तो गुजरात पर्यटन विभाग और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं।
उपयोगी लिंक:
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)
Frequently Asked Questions
द्वारका समुद्र में कितनी गहराई पर है?
पानी के नीचे द्वारका के अवशेष गुजरात के समुद्र तट से लगभग 20-40 मीटर (65-130 फीट) की गहराई पर स्थित हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह प्राचीन नगरी लगभग 3000-5000 साल पहले समुद्र में समा गई थी।
अगर आप पानी के नीचे द्वारका के बारे में और जानना चाहते हैं, तो आप हमारी इस article को detail में पढ़ सकते है या भारतीय समुद्री पुरातत्व संस्थान (NIO) की रिपोर्ट्स पढ़ सकते हैं।
द्वारका कब जाना चाहिए?
द्वारका घूमने का सबसे best time है October- March । इस समय वहां का मौसम सुहावना और ठंडा होता है, जो यात्रा के लिए best है।
गर्मी के महीने (अप्रैल से जून) में यहां का तापमान 35-40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है, जिससे यात्रा थोड़ी असुविधाजनक हो सकती है। वहीं, मानसून (जुलाई से सितंबर) में भारी बारिश के कारण कई प्रकार की कठिनाई हो सकती है।
द्वारका में घूमने के लिए मुख्य आकर्षण द्वारकाधीश मंदिर, बेयट द्वीप और सुदामा सेतु हैं। यदि आप समुद्र से जुड़ी गतिविधियों में रुचि रखते हैं, तो इन गतिविधियों के लिए शीतकालीन मौसम सबसे उपयुक्त है।
क्या हम पनडुब्बी से द्वारका पानी के अंदर जा सकते हैं?
जी हां, आप पनडुब्बी में बैठकर समुद्र में खोजे गए भगवान श्री कृष्ण का द्वारका नगरी का दर्शन कर सकते हैं इसके लिए गुजरात सरकार ने मझगांव डॉक शिपयार्ड कंपनी के साथ समझौता किया है जिससे द्वारका के समुद्र किनारे पर पनडुब्बी से पर्यटन शुरू किया जा सके।
इस पनडुब्बी से समुद्र में 300 फ़ीट नीचे जाकर द्वारका के अवशेषों को देखा जा सकता है । यह पूरी यात्रा 2 से 2.5 घंटे की होगी ।


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